दुबई का कार्यक्रम बनने की भी कहानी अजीब दुबई कभी जाने को मिलेगा यह सोचा भी नहीं था। इस्लामिक देश होने की खातिर तरह-तरह के खयाल आते थे, हालांकि मैं पाकिस्तान जाकर आया था, पर पाकिस्तान तो कभी भारत का ही अंग था इसलिये इतना ज्यादा कुछ महसूस नहीं होता था। दुबई में भी कई मिलने वाले रहते हैं, उनसे अच्छे समाचार ही मिलते थे फिर भी दुबई के रेगिस्तान में क्या घूमने जाना ? यही सोच कर रह जाते थे लेकिन अचानक कार्यक्रम बन गया और हम जा भी आये इसके पीछे भी एक अजीब कहानी है। मेरा जब भी बाहर जाने का कार्यक्रम बनता है कुछ यार-दोस्तों और प्रात:काल के कतिपय इच्छुक पाठकों में आस जागृत हो जाती है कि उन्हें मेरे संस्मरण जरूर पढऩे को मिलेंगे। मैं यही सोचता हूं कि क्या वो की वो बातें बार-बार लिखना लेकिन इन लोगों को इसी में मजा आता है। मेरे एक मित्र हैं डॉ. देवेन्द्र भट्ट। आयुर्वेदाचार्य हैं, मेरे छोटे भाई जैसे हैं, ये मेरे पीछे पड़े ही रहते हैं। पूछते हैं कि अब मैं कब बाहर जा रहा हूं। मैं इन्हें यही कहता हूं कि बार-बार जाना थोड़े ही संभव होता है। पहले तो साल-दो साल में प्रधानमंत्री के साथ जाने का नम्बर भी लग जाता था मगर पिछले कई वर्षों से इसका भी कोई योग नहीं बन रहा जबकि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएं पहले से कई गुना ज्यादा बढ़ गई हैं। हकीकत में आजकल टी.वी. चैनलों का बोलबाला है इसलिए इन्हीं के पत्रकारों को तरजीह मिलती है, फिर दिल्ली में रहने वाले पत्रकार अपनी जोड़-तोड़ बिठा लेते हैं। मेरी एसी आदत नहीं इसलिये कोई शिकायत भी नहीं। देवेन्द्र की दीवानगी तब सीमा पार कर जाती है जब वह कहता है कि भाई साहब, हमारे लिये यात्रा करो और अपने संस्मरण लिखो। पैसे का इन्तजाम हम करेंगे। इसी तरह कल्पना नर्सिंग होम के डॉ. सुनील चुघ भी निरन्तर इच्छुक रहते हैं। डॉ. चुघ की उदयपुर के चिकित्सा क्षेत्र को आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नब्बे के दशक की शुरूआत में मैंने उदयपुर में सी.टी. स्केन मशीन लगाने की पुरजोर मांग उठाई थी। उस वक्त यह मशीन बहुत बड़ी बात थी, आज तो निजी क्षेत्र में चिकित्सा सेवाओं ने बहुत तरक्की कर ली है और सार्वजनिक चिकित्सालय भी इस दृष्टि से काफी समृद्ध हो गया है मगर उस काल में डॉ. चुघ ने हिम्मत करके अपने क्लिनिक में उदयपुर की पहली सी.टी. स्केन मशीन लगाई और उसका उद्घाटन भी मुझ से ही करवाया। यह सन् ९४ की बात है। फिर ९६ में उन्होंने कलर डोपलर और ९८ में एम.आर.आई. मशीन लगाई। ये भी उदयपुर के लिये प्रथम थी। डॉ. चुघ का बराबर आग्रह रहता है कि मैं अपने संस्मरणों को पुस्तकों के रूप में प्रकाशित करूं ताकि इनकी पहुंच एक बड़े वर्ग तक हो सके मगर मैंने इस तरफ ध्यान दिया ही नहींं । मेरा तमाम लेखन इन्टरनेट पर प्रात:काल की वेबसाइट और मेरी खुद की वेबसाइट पर उपलब्ध है इसलिये सोचता हूं कि क्या जरूरत है। डॉ. भट्ट और डॉ. चुघ तो उदाहरण मात्र हैं वरना देश भर से फोन और पत्रों के माध्यम से, और अब तो इनमें फेसबुक व ट्विटर भी जुड़ गया है, पाठकों की पूछताछ आती रहती है कि पुस्तकें छपी या नहीं, कब तक छप रही हैं आदि। इन्हीं से प्रेरित होकर अन्तत: मैंने पुस्तकें प्रकाशित करने का फैसला कर ही लिया। इस बीच प्रात:काल का इन्टरनेट संस्करण भी पूरी दुनिया में बसे हिन्दी भाषी भारतीयों तथा भारतवंशियों में बहुत लोकप्रिय हो गया इसलिये दुनिया भर से फोन, ई मेल और मैसेज आने लगे। प्रात:काल की वेबसाइट का दर्जा दुनिया भर की तमाम वेबसाइटों में एक लाख पांच हजार के आसपास है। यह जब एक लाख के भीतर पहुंच जायगा तो इसका अंकन विशिष्ट श्रेणी में आ जायगा। वैसे भी भारत के हिन्दी समाचार पत्रों की १० प्रमुख वेबसाइटों में प्रात:काल का नाम आता है जो कि बहुत बड़ी उपलब्धि है। प्रात:काल जैसा छोटा-सा अखबार जागरण, भास्कर, नवभारत टाइम्स, पंजाब केसरी और राजस्थान पत्रिका जैसे दिग्गज अखबारों की श्रेणी में नजर आता है तो यकीन नहीं होता। मेरे बड़े भाईसाहब हैं श्री सुनील गोयल। मेरे जीवन को दिशा देने में उनका तथा उनकी धर्मपत्नी और मेरी ममतामयी भाभी श्रीमती मीता गोयल का अप्रतिम योगदान है। मैंने विवाह नहीं किया इसलिये मेरी स्वर्गीय माताजी बड़ी चिन्तित रहती थी कि इसका क्या होगा, कौन इसकी सार-सम्भाल करेगा आदि लेकिन इन दोनों ने जीवन भर जिस तरह मेरी आवश्यकताओं, इच्छाओं और आराम का ख्याल किया कि मुझे लगने लगा जैसे मैं कोई भगवान का रूप हूं। कई बार अनायास ही मेरे मुख से कोई बात निकल जाती तो मैं देखता कि वह पूरी हो गई है। मैं पूछता कि यह क्यूं किया? तो जवाब मिलता कि आपने ही तो एसी इच्छा व्यक्त की थी। यह सिलसिला जारी रहा तो मुझे ही अपने मुख से कोई बात निकालने से पहले ध्यान रखना शुरू करना पड़ा। भाई साहब ने भी दुबई से लौटते ही राग अलापना शुरू कर दिया कि यात्रा के संस्मरण तो लिखने ही हैं। वे कई मिलने वालों का हवाला देने लगे कि सब लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं कि संस्मरण कब शुरू हो रहे हैं। मुझे लिखने में मजा तो आता ही है, जब इतना उत्साहवर्धन और प्रशंसा मिले तो किस लेखक की कलम रूक सकती है? (जारी) द्यद्यद्य
दुबई यात्रा संस्मरण-१
दुबई यात्रा संस्मरण -२
विश्व की व्यावसायिक राजधानी बन गया है दुबई लिखने की जहां तक बात है इन्टरनेट का इस्तेमाल सीखने के बाद मेरी लेखनी और पैनी हो गई। ट्विटर के माध्यम से भावाभिव्यक्ति और भी आसान हो गई। हालांकि अभी भी मैं कागज पर ही लिखता हूं और कम्प्यूटर आपरेटर इसे ट्विटर व फेसबुक पर चढ़ाते हैं पर इसे जो सार्वभौम प्रशंसा मिली उससे मुझे यह क्रम जारी रखने की प्रेरणा मिलती रही। इसका एक दुष्प्रभाव जरूर मैंने महसूस किया कि व्यवस्था के विरूद्ध अपना आक्रोश निरन्तर व्यक्त करने की वजह से मेरा स्वभाव उग्र होने लगा। बीच में दो तीन घटनाएं एसी घटी कि मैं अपने व्यवहार से ही आश्चर्यचकित रह गया, सामान्यत: वैसे परिस्थितियों में मैं शान्त रहता हूं। इन्टरनेट की ही देन है कि मैं दुबई से भी अपने ट्विटर निरन्तर भेजता रहा। यह मानव सभ्यता को विज्ञान की सबसे बड़ी देन है। जिस तरह बिजली हमारे जन जीवन की धड़कन बन चुकी है, इन्टरनेट भी धीरे-धीरे वही स्थान प्राप्त कर रहा है। अब तो इस पर हिन्दी की साइट्स भी बहुत प्रचुरता से बढ़ती जा रही हैं इसलिये अंग्रेजी नहीं जानने वाले लोग भी अधिकाधिक इसका प्रयोग कर पा रहे हैं। बच्चों का आलम तो यह है कि जिस घर में यह सुविधा है अभिभावकों का बच्चों से कम्प्यूटर छुड़ाना मुश्किल हो गया है। पहले जो समस्या टी.वी. के साथ थी कि बच्चे कार्टून चैनलों से चिपके ही रहते थे, उसमें अब इन्टरनेट और जुड़ गया है। टी.वी. से हटाओ तो इन्टरनेट पर बैठ जायेंगे और वहां से उठाओ तो टी.वी. पर। हर चीज की अति तो खराब होती ही है फिर भी इसका उज्ज्वल पक्ष यह है कि बचपन में ही कम्प्यूटर से अभ्यस्त हो जाने के कारण हमारे बच्चे कम उम्र में ही प्रवीण होते जा रहे हैं और जटिल से जटिल गुत्थिया चुटकियों में सुलझा देते हैं जिन्हें ले कर बड़े बड़े लोग पच जाते हैं । यही कारण है कि हमारी प्रतिभाएं विश्व भर में अपनी योग्यता की पताकाएं ïफहरा रही हैं । कल की ही बात है। मुझे अंग्रेजी फिल्में देखने का बड़ा शौक है। विश्व युद्धों, रंगभेद अत्याचारों, यहूदी नरसंहार, नागरिक अधिकार आन्दोलनों आदि पर कई उत्कृष्ट फिल्में बनीं पर सिर्फ इनका नाम ही सुना, कभी कहीं देखने को नहीं मिली। अब ये तमाम फिल्में इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं। नई से नई हिन्दी फिल्मों से लेकर पुरानी से पुरानी अंग्रेजी फिल्म। मेरे साथ समस्या यह है कि मुझे कम्प्यूटर पर देखने में मजा नहीं आता, मैं तो टी.वी. के सामने सोफे पर लेटकर देखता हूं तभी उसका रसास्वादन ले पाता हूं। वैसे तो आजकल एसे टी.वी. आ गये हैं जिनमें यू.एस.बी. की सुविधा होती है जिसमें पेन ड्राइव लगा कर फिल्में देख सकते हैं मगर ये बहुत महंगे आते हैं । डी.वी.डी. प्लेयरों में भी यह सुविधा आने लगी है मगर हमारे प्लेयर में नहीं है जो कि टी.वी. के साथ ïफ्री आया था । मेरी पोती है पलक। भाई साहब के तीन पुत्र हैं। संदीप, महीप और सुमीत। तीनों क्रमश: जयपुर, मुम्बई और उदयपुर का काम देख रहे हैं। मैं आजाद हो गया हूं। पलक, संदीप की बेटी है, मुम्बई में इंजीनियरिंग पढ़ रही है। बहुत ही होनहार और होशियार, कम्प्यूटर का ज्ञान तो जैसे उसकी नस-नस में व्याप्त है। भाई साहब के बच्चे मुझे शुरू से ही चाचाजी कहते थे इसलिए सभी मुझे चाचाजी ही कहने लगे। उनसे बड़े चचेरे भतीजे तो आज भी काका साहब ही कहते हैं। पोते-पोतियां दादू कहने लगे तो अब नई पीढ़ी मुझे दादू ही कहने लगी। दुबई आज दुनिया की व्यावसायिक राजधानी बन गई है। यहां का वैभव और अट्टालिकाओं का जंगल देख कर दुनिया के आधुनिकतम शहरों के लोग भी दांतों तले उंगलियां दबाते हैं। कभी जब अमेरिका के न्यूयार्क और शिकागो जैसे शहर मुक्त व्यापार व्यवस्था के परिणामस्वरूप प्रगति और आधुनिकता की अंगड़ाई ले रहे थे और एक के बाद एक ऊ ंची-ऊंची इमारतों को अपनी नभ रेखा में शामिल कर रहे थे तब दुनिया के सिरमौर बने इंगलेण्ड से अंग्रेज व्यापारी अमेरिका जाते थे तो उन इमारतों को देख कर नाक-भौं सिकोड़ते थे और फिकरे कसते थे- धन की बरबादी। कालान्तर में अमेरिका विश्व का सबसे सम्पन्न औद्योगिक देश बन गया और इंगलेण्ड, जिसके बारे में कहा जाता था कि इसका सूरज कभी अस्त नहीं होता, अमेरिका का छुटभैया और जी हजुरिया बन कर रह गया। आज वही स्थिति दुबई की है। अब इंगलैण्ड के नहीं वरन अमेरिका के व्यापारी और उद्योगपति यहां आते हैं तो वैसी ही प्रतिक्रिया देते हैं जैसी उनके देश के लिये अंग्रेज दिया करते थे मगर थोड़े दिनों पश्चात् ही धन कमाने और अपने व्यापार का प्रसार करने वे भी दुबई के वाणिज्यिक साम्राज्य का अंग बन जाते थे। अमेरिका में मंदी आने के बाद दुबई में भी अल्पकालीन मंदी आई मगर साल भर में ही यह पुन: प्रगति की दौड़ में शामिल हो गया। दुबई के इसी अट्टालिक ाओं के जंगल में बड़ी-बड़ी शोपिंग माल अवस्थित हैं जहां हर तरह की चीज मिलती है। ऐसी ही एक माल में हम घूम रहे थे तो बड़ा सा इलेक्ट्रोनिक सामान का शो रूम नजर आया। यहां बड़े-बड़े टी.वी., कम्प्यूटर, केमरे आदि हर तरह का सामान अत्यन्त विविधता से मिल रहा था। वैसे तो इन दिनों भारत में भी हर चीज उपलब्ध है फिर भी बड़े आकार के एल.सी.डी. और एल.इ.डी. टीवी के दामों में भारत की अपेक्षा २०-२५ हजार का अन्तर रहता है। कस्टम विभाग भी प्रति व्यक्ति एक टी.वी. की तो अनुमति देता है, थोड़ा बड़ा हो तो उस पर मामूली शुल्क लग जाता है। महीप को टी.वी. लेना था इसलिये हम सब टी.वी. देख रहे थे मगर दाम भारत के मुकाबले कम नहीं प्रतीत हो रहे थे। इसी बीच पलक मेरे पास आई और बोली, दादू आपके लिये एक अच्छी चीज मिल गई है। मैंने पूछा क्या तो उसने एक छोटा-सा बटवे जैसा उपकरण बताया और कहा कि यह किसी भी टी.वी. में फिट हो जाता है और इसमें कोई भी पेन ड्राइव या हार्ड डिस्क लगा कर कम्प्यूटर से डाउनलोड की हुई फिल्म देख सकते हो। मैंने कहा यह तो बहुत अच्छी चीज है। हमने वह चीज ले ली। उदयपुर आकर कम्प्यूटर में जो फिल्में थी वह इसमें लेकर टी.वी. पर चलाने की कोशिश की तो चली ही नहीं। ये फिल्में कम्प्यूटर पर चल रही थी, टी.वी. पर मेन्यू में भी इनका नाम आ रहा था मगर चित्र नहीं। सब कोशिश करके पच गये। सुमीत ने बहुत माथा पच्ची की, हमारे कम्प्यूटर विशेषज्ञों ने भी ट्राई की मगर नतीजा शून्य। पलक से बात हुई तो उसे तुरन्त समस्या समझ आ गई। उसने सुमीत को फोन पर ही निर्देश दिये कि एसा करो-वैसा करो। सुमीत करता गया और अन्तत: सफलता प्राप्त हो गई। मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। मैं नये युग के बच्चों की प्रवीणता पर आश्चर्य व्यक्त करते रह गया। (जारी)
दुबई यात्रा संस्मरण -३
दुबई की भौगोलिक स्थिति प्रगति का कारण बनी दु बई फारस की खाड़ी में अवस्थित है जिसे परशियन गल्फ और आजकल सिर्फ गल्फ कहा जाता है। फारस की खाड़ी हिन्द महासागर का ही विस्तार है जो कि इरान और अरब प्रायद्वीप के बीच है। खाड़ी में मूंगे की चट्टानें हैं और यहां प्रचुर मात्रा में मोती पाये जाते हैं। खाड़ी के तटीय इलाके विश्व के कच्चे तेल के सबसे बड़े एकल स्त्रोत हैं। खाड़ी के बहरीन, इरान, इराक, सउदी अरब, कतर व संयुक्त अरब अमीरात (यू.ए.ई.) विश्व का २५ प्र.श. तेल उत्पादित कर रहे हैं। दुबई यू.ए.ई. का ही हिस्सा है। खाड़ी क्षेत्र में विश्व के लगभग दो-तिहाई कच्चे तेल का तथा एक तिहाई प्राकृतिक गेस का भण्डारण है। दुबई तथा अन्य खाड़ी देशों की प्रगति का कारण तेल तो है ही मगर एक अन्य महत्वपूर्ण कारण इनकी भौगोलिक स्थिति है। दुनिया भर में जहां भी खाड़ी पर अवस्थित शहर हैं या जिनकी तट रेखा कटी-फटी हैं वे प्रगति और समृद्धि में सबसे आगे हैं क्यूंकि वहां प्राकृतिक बन्दरगाह बन गये जो यातायात को अत्यन्त सुगम बना देते हैं। दिल्ली जैसे अपवाद छोड़ दें तो विश्व के सभी बड़े-बड़े शहर स्वाभाविक बन्दरगाह ही हैं। मानव सभ्यता के इतिहास में यातायात की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जहां-जहां यातायात के साधन विकसित हुए वहीं मानव बस्तियां बसने लगी। दुनिया की तमाम प्राचीन सभ्यताएं नदियों की घाटियों में ही बसी हैं चाहे वह नील नदी की घाटी हो या सिन्धु नदी की। मेसोपोटामिया की सभ्यता टिगरीस और यूफरीटस नदियों की घाटियों के बीच पनपी तो चीनी सभ्यता यांगटीसी नदी की घाटी में। हमारे अपने बड़े-बड़े शहर गंगा-यमुना व अन्य नदियों के किनारे अवस्थित हैं। जलमार्ग की तरह रेल, सड़क और वायु मार्गों ने भी सभ्यता के विकास में अपना योगदान सिद्ध किया है। दुनिया के विभिन्न भागों में जहां-जहां से रेल लाइनें गुजरी, बाजार पनप गये, बस्तियां बस गई, विकास और उत्थान अपने आप हो गया। यही बात सड़कों के साथ भी हुई। हमारे देश ने दो प्रधानमंत्रियों के काल में आशातीत प्रगति की। यह संयोग नहीं है कि इन दोनों, नरसिंह राव ने रेल मार्ग बिछाने और अटल बिहारी वाजपेयी ने सड़कों का विस्तार करने पर जोर दिया। वाजपेयी तो चाहते थे देश भर की नदियों को जोडऩे का कार्य भी हो मगर कई लोगों और बाद की सरकारों ने इसका विरोध किया और वाजपेयी की दूरदृष्टि को समझ नहीं सके। यदि नदियों को एक नहीं किया जा सके तो देश भर को नहरों के जाल से तो जोड़ा ही जा सकता है। नहरें भी इतनी चौड़ी हो जिससे उनमें माल और यात्रियों का परिवहन हो सके । मगर देश के नेताओं और पार्टियों की जो दशा है और उनमें दिशा और दृष्टि का जो अभाव है उससे फिलहाल तो यह संभव नहीं लगता। यह इसी से पता चलता है कि हमारे देश की जो हजारों किलोमीटर लम्बी तटरेखा है, खंभात की खाड़ी से लेकर बंगाल की खाड़ी तक उसका भी हम यातायात के लिये उपयोग नहीं कर पाये हैं, पर्यटन के लिये उपयोग करना तो बहुत दूर की बात है। छोटे-छोटे देश अपने समुद्री तटों और बन्दरगाहों को पर्यटन केन्द्रों में बदल कर करोड़ों डालर की विदेशी मुद्रा कमा रहे हैं। लोग समुद्री यात्रा का आनन्द उठाने इन देशों से चलने वाले क्रूज लेते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि भारत से भी लाखों की संख्या में पर्यटक जाते हैं और विदेशी मुद्रा खर्च करते हैं। आज हालत यह हो गई है कि भारत आने वाले पर्यटकों की संख्या ५० लाख है जबकि भारत से विदेश में पर्यटन को जाने वालों की संख्या एक करोड़ का आंकड़ा छू रही है। भारतीय तटों पर पहले से ही महत्वपूर्ण पयर्टन स्थल विद्यमान हैं। यदि रोयल केरेबियन क्रू ज और स्टार क्रूज की तरह भारत में भी कोई क्रूज चला दिया जाय तो हम लाखों की संख्या में बाहर जाने वले पर्यटकों को रोक सकेंगे। साथ ही लाखों अन्य विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर सकेंगे। आश्चर्य इस बात का भी है कि हम अपने क्रूज तो चलाते नहीं ही है, साथ ही विदेशी क्रूजों को भी अपने तटों पर उतरने नहीं देते। यह महज लालफीताशाही की पराकाष्ठा और अकर्मण्यता है वरना इससे तो विदेशी पर्यटकों को भारत आने का मौका ही मिलेगा और इसके लाभ हमारे देश के लोगों को मिलेंगे। वायु मार्ग किस तरह विकास में सहायक होते हैं इसका ज्वलन्त उदाहरण उदयपुर है जो वर्षों से नियमित वायु सेवाओं से जुड़ा हुआ है। जब प्रदेश के अन्य बड़े शहरों को यह सुविधा मुहैया नहीं थी तब उदयपुर को यह अवसर मिला जिसका प्रबल प्रभाव यहां के पर्यटन क्षेत्र के विकास में देखा गया। जोधपुर और जैसलमेर भी जब वायु मार्ग से जुड़े तो यहां पर्यटन पनप गया वरना साठ व सत्तर के दशक में हालत यह थी कि एक पर्यटक तक यहां देखने को नहीं मिलता था। यातायात के मार्ग किस तरह प्रगति के वाहक हैं यह जग जाहिर है फिर भी हमारे देश में इसके प्रति चेतना नहीं है। खाड़ी में स्थित होने और प्राकृतिक बन्दरगाह होने का लाभ तो हमारे मुंबई जैसे शहर उठा लेते हैं लेकिन इसके साथ जो दायित्व जुड़े होते हैं उसकी हम परवाह नहीं करते। खाड़ी पर बसा हर शहर कटी फटी तट रेखा पर एक पतली पट्टी की तरह बना होता है जिसके आसपास जलराशि अधिक होती है। एसे शहरों में भूमिगत रेल सेवा, समुद्र में सुरंगों से बने मार्ग और जलराशि के उपर बड़े बड़े पुल आवश्यक हैं। दुनिया भर के खाड़ी शहरों में ये आवश्यकताएं वर्षों पूर्व पूरी कर ली गई मगर मुम्बई जैसे शहर में न तो भूमिगत ट्रेन हैं, न समुद्र के नीचे कोई सुरंग मार्ग है। समुद्र के उपर एक अदद पुल भी साल भर पहले ही बना है वह भी सिर्फ बान्द्रा से वरली के बीच जबकि एसे पांच-सात पुल मुम्बई के लिये अति आवश्यक हैं। यह विडम्बना ही है कि इन पंक्तियों को लिखते वक्त मेरे कम्प्यूटर पर एक ट्विटर फ्लेश हो रहा है कि चीन में दुनिया का सबसे बड़ा २६ मील लम्बा समुद्री पुल बन कर तैयार है जो ५००० खंभों पर खड़ा है। हकीकत तो यह है कि हमारे यहां संसाधनों की कोई कमी नहीं मगर इसके लिये आवश्यक इच्छा शक्ति बिल्कुल नहीं। जो लोग चुन कर सरकार बना लेते हैं वे भी बजाय काम करने के राजनीति में मशगूल रहते हैं और विपक्ष के साथ निरर्थक थूका-फजीती करते रहते हैं। (जारी) द्यद्यद्य
दुबई यात्रा संस्मरण -४
विवाह की स्वर्ण जयन्ती नहीं मनाने दुबई यात्रा हप्तम लोग पुरखों से कागज का धन्धा करते हैं इसीलिये हमें कागजी अटक से जाना जाता है। गोयल और अग्रवाल नाम तो बाद में जुड़े वरना पहले तो सब कागजी नाम से ही पुकारते थे। आज भी समाज के नूते-पाते तो इसी नाम से चल रहे हैं। हमारे यहां पुरखों से जलने से ठीक होने का एक मल्हम बनता है जो नि:शुल्क वितरित होता है। यह कागजियों का मल्हम नाम से ही मशहूर है। मल्हम की प्रसिद्धि इतनी है कि दूर-दराज के शहरों तक से लोग उदयपुर में अवस्थित अपने रिश्तेदारों के माध्यम से इसे मंगाते हैं। इस मल्हम की खासियत यह है कि इसे लगाने के बाद घाव के निशान नहीं रहते। इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि अस्पताल तक से मरीजों को यह मल्हम लेने भेजा जाता है। दीवाली के दिनों में तो इसकी मांग इतनी बढ़ जाती है कि हमें पहले से तैयारी करके रखनी पड़ती है। इसके बावजूद भी कई बार एसा होता है कि मल्हम खत्म हो जाता है। उस वक्त बहुत बुरा लगता है जब लोगों को मना करना पड़ता है और लोग याचना करते हैं कि थोड़ा सा तो दे दो। मल्हम बनाने की विधि भी पीढिय़ों से हस्तान्तरित हो रही है। पहले पिताजी बनाते थे, फिर माताजी, फिर बड़ी बहन और अब भाभीजी यह काम करती हैं। पीढ़ीयों पहले हम लोग शायद जयपुर से आये क्यूंकि आज भी बच्चों का जडूल्या उतरवाने हमें जयपुर के पास डिग्गी-मालपुरा क्षेत्र में अवस्थित सिन्दुरिया माताजी के मन्दिर में जाना पड़ता है। हमें तो अपने दादाजी के बारे में भी ज्यादा कुछ नहीं पता। सिर्फ उनका नाम पता है हरिकिशन अग्रवाल। उनके पिताजी थे चतुर्भुज अग्रवाल। हमारी कागज की और बहियों की नामी फर्म थी चतुर्भुज हरिकिशन अग्रवाल, आज भी उदयपुर के बड़े बाजार में यह दुकान अवस्थित है। हरिकिशन के दो पुत्र थे सुखलाल और गोपाल लाल। सुखलाल कागजी शहर के नामी गिरामी व्यक्ति थे और उन्होंने अपना कामकाज खूब फैलाया तथा बहुत प्रतिष्ठा अर्जित की। गोपाल लाल उनके छोटे भाई और मेरे पिताजी थे। गोपाललाल कागजी ने सन १९३० में उदयपुर का पहला प्रिन्टिंग प्रेस 'श्रीकृष्णा प्रिन्टिंग प्रेसÓ के नाम से खोला और उदयपुर के इतिहास में युग परिवर्तनकारी पन्ना जोड़ा। कालान्तर में इस प्रेस ने खूब प्रगति की और गोपाल लाल कागजी ने प्रसिद्धि। यह वो जमाना था जब कल-कारखानों का इतना चलन नहीं था। युवा गोपाल जब एक उद्योग चलाने लगे तो शीघ्र ही सब उन्हें मैनेजर साहब कहने लगे। उस काल में यह बहुत बड़ी उपाधि थी। अपने पति को मैनेजर पुकारते सुनती युवा गोकुल फूले नहीं समाती थी और कभी-कभी खुद ही उन्हें इस शब्द से पुकार कर मजे लेती थी लेकिन गोकुल की ये खुशियां ज्यादा टिकी नहीं, उसने एक के बाद एक सात लड़कियों को जन्म दिया जिनमें से ४ जिन्दा रहीं। एक भी पुत्र नहीं। बहुत मन्नतों के बाद आखिरकार एक पुत्र हुुआ मगर गोकुल के दु:खों का अन्त नहीं था। पुत्र जिन्दा नहीं रहा। कितने देवरे धोके, कितनी पूजा पाठ की मगर कोई फायदा नहीं, अन्तत: किसी ने राय दी कि पुष्कर स्नान से जरूर तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी तो पुष्कर की यात्रा की और पुत्र कामना कर मनौती की कि पुत्र का नाम वह पुष्करजी के नाम पर ही रखेगी। अन्तत: उनकी इच्छा पूर्ण हुई और २४-०१-४१ को सुनील भाईसाहब का अवतरण हुआ। सातवीं कक्षा तक उनका नाम पुष्करलाल ही था बाद में मेरी बड़ी बहिन सुशीला ने जब उन्हें विद्याभवन में प्रवेश दिलाया तो नाम सुनील किया। मेरी तीसरे नम्बर की बहन सुशीला अग्रवाल बचपन से ही आधुनिका थी। सुन्दर, शोख व चंचल । हर क्षेत्र में आगे। स्कूल का हर स्पोर्ट्स जीतती थी, लड़के उनके आगे-पीछे चक्कर लगाते थे। तब विद्याभवन का स्टेण्डर्ड माना जाता था इसलिये पुष्करलाल जैसा नाम दकियानूसी लगता था। मैं तो आज भी उन्हें पुष्कर दा और अशोक भाई साहब पुष्कर माम्सा कह कर पुकारते हैं। कई पुराने दोस्त और रिश्तेदारों के लिये भी वे आज भी पुष्कर ही हैं। सबसे बड़ी बहिन धीर, गंभीर और सीधी शान्ता अग्रवाल का विवाह एक होनहार नवयुवक चांदमल के साथ हुआ जिन्होंने अगले ही साल जन्माष्टमी १३-०८-४३ को एक बेटे को जन्म दिया, स्वाभाविक रूप से उसका नाम कृष्ण ही रखा जाना था। परिवार फिर खुशियों के जश्न में डूब गया मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था। गोकुल फिर गर्भवती हुई और वज्रपात हो गया। तब बैटियों के गर्भधारण करने तक मांए भी गर्भवती होती रहती थी । शान्ता के पति चान्द उदयपुर के माने हुए तैराक थे। महाराणा के दरबार तक उनकी ख्याति थी। कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि को वे अपने मित्रों के साथ दूध तलाई में ऊ पर से गोते लगा रहे थे। इसी दौरान एक बार गहरी डाइव मारी तो वे नीचे झाडिय़ों में फंस कर रह गये। वे इतने लोकप्रिय थे कि समाज में उनके मित्रों ने उनकी स्मृति में एक पुस्तकालय की स्थापना की जिसका नाम चांद पुस्तकालय रखा गया। यह वो जमाना था जब समाज में विधवाओं की स्थिति अत्यन्त शोचनीय थी। गोपाल दुस्साहस करके शांता और उसके पुत्र कृष्ण को अपने घर ले आया। शांता अपने पैरों पर खड़ी हो सके इसलिये उसे महिला मंडल रात्रि स्कूल में प्रवेश दिलाया।गोपाल ने शांता से छोटी सज्जन का नियमित स्कूल छुड़ा उसे भी रात्रि स्कूल में भर्ती करा दिया ताकि शांता को सम्बल मिले। बड़ी बहिन के लिये छोटी बहिन के इस त्याग को देख सबके ह्रदय द्रवित हो जाते थे। तब नारी शिक्षा के प्रति इतनी जागृति नहीं थी, एसे में एक विधवा का स्कूल जाना लोगों को रास नहीं आया। जब शांता पुस्तकें लेकर, नीची नजरें किये स्कूल जाती तो लोग फिकरे कसते- देखो! देखो! राण्ड स्कूल जाई री है। लेकिन न तो शांता ने और न गोपाल-गोकुल ने हिम्मत हारी, विरोध और फिकरे धीरे-धीरे अपने आप ही बन्द हो गये। इस बीच २४-०८-४४ को मैंने जन्म लिया। चार बड़ी बहिनों के संरक्षण में हम तीनों भाई पलने बढऩे लगे। हमारे पड़ौस में ही एक युवक दधिमति रहते थे उन्हें कृष्ण नाम पसन्द नहीं आता था। उन दिनों अशोक कुमार अत्यन्त लोकप्रिय अभिनेता थे तो उन्होंने कृष्ण का नाम अशोक रख दिया। यही अशोक आगे जाकर नगर परिषद के पार्षद चुने गये और तत्कालीन जनसंघ के बड़े नेता बने। पिताजी की तबियत अच्छी नहीं रहती थी इसलिये सुनील २० साल का भी नहीं हुआ कि उसकी शादी की बात चलने लगी और अन्तत: ४ जुलाई, १९६१ को उसकी शादी मीता देवी से कर दी गई। उस बात को आज के दिन पूरे ५० साल हो गये हैं। विवाह की स्वर्ण जयन्ती को पूरा परिवार समारोहपूर्वक मनाने विभिन्न उत्सव आयोजित करना चाहता था मगर मीता भाभीजी ने साफ इन्कार कर दिया। न तो उन्होंने कभी अपना जन्म दिन मनाया, उनका जन्म दिन कब आता है यह स्वयं उन्हें नहीं पता, न उन्होंने कभी शादी की वर्षगांठ या रजत जयन्ती मनाई, न वे इसकी पक्षधर रहीं। () उनका यही कहना था कि इससे तो अच्छा है कि दान-पुण्य और धर्मार्थ कार्यों में पैसा लगाओ। सबने उन्हें कहा कि यह काम तो पहले से ही कर ही रहे हैं और इस साल और अधिक करेंगे मगर उत्सव भी करें। इस पर भी वे नहीं मानी मगर सब लोग जिद पर अड़ गये तो उन्होंने कहा कि सब लोग सपरिवार कहीं घूमने चलते हैं। पर शादी की स्वर्ण जयन्ती के नाम पर नहीं वरन एसे ही । सबको यह बात मंजूर थी । इस पर स्थान का चयन होने लगा। घूम-फिर कर दुबई ही एसा सस्ता गंतव्य नजर आया जहां पूरे परिवार के साथ जाया जा सके और खर्चा भी ज्यादा नहीं हो इसलिये दुबई का कार्यक्रम बना। (जारी) द्यद्यद्य उनका यही कहना था कि इससे तो अच्छा है कि दान-पुण्य और धर्मार्थ कार्यों में पैसा लगाओ। सबने उन्हें कहा कि यह काम तो पहले से ही कर ही रहे हैं और इस साल और अधिक करेंगे मगर उत्सव भी करें। इस पर भी वे नहीं मानी मगर सब लोग जिद पर अड़ गये तो उन्होंने कहा कि सब लोग सपरिवार कहीं घूमने चलते हैं पर शादी की स्वर्ण जयन्ती के नाम पर नहीं वरन एसे ही । सबने यह बात मंजूर कर ली । इस पर स्थान का चयन होने लगा। घूम-फिर कर दुबई ही एसा सस्ता गंतव्य नजर आया जहां पूरे परिवार के साथ जाया जा सके और खर्चा भी ज्यादा नहीं हो इसलिये दुबई का कार्यक्रम बना। (जारी)
दुबई यात्रा संस्मरण-५
दुबई- जहां व्यापारी देश की नितियों का निर्धारण करते हैं दु बई का नाम उच्चारित करते ही दाउद का ख्याल आ जाता है और मन नफरत से भर जाता है। दाउद हालांकि पाकिस्तान में रहता है मगर उसकी डी कम्पनी के सारे काम काज दुबई से नियंत्रित होते हैं। दुबई में उसके भाई-बहनों के नाम पर इलेक्ट्रोनिक्स, गारमेन्ट्स, वीडियो आदि के कई शोरूम हैं मगर इनका असली धन्धा तो जाली नोट चलाना, हवाला, अपहरण, जबरन वसूली, ड्रग्स और सुपारी लेकर हत्याएं करवाना है। आश्चर्य इस बात का है कि दुबई में इतने सख्त कानून होने के बावजूद न तो इनके धन्धे पर कोई असर पड़ा और न कोई इन पर हाथ डाल सका। दाउद इब्राहिम अपनी बेटी का खुले आम दुबई में जावेद मियांदाद के बेटे से विवाह करता है और कोई उसे पकड़ नहीं सकता वह भी तब जब वह इन्टरपोल की वांछित अपराधियों की सूची में हो और उसकी डी कम्पनी को अमरीकी संसद ने आपराधिक आतंकवादी संगठन करार दिया हो। न केवल भारत वरन अमरीकी सरकार द्वारा भी वह सर्वाधिक वांछित अपराधी करार दिया गया। ऐसे परिपे्रेक्ष्य में किसी न किसी स्तर पर मिलीभगत की साजिश जरूर प्रतीत होती है। हालांकि दुबई के प्राचीन इतिहास के बारे में तथ्यात्मक जानकारी नहीं है लेकिन पुरातत्व खोजों से पता चलता है कि चार हजार साल पहले मछुआरे यहां रहते थे। इसी काल में घुमक्कड़ चरवाहों की उपस्थिति के भी उल्लेख मिलते हैं। इस रेगिस्तान में कृषि तो संभव नहीं थी इसलिये यहां खजूर उगाए गए जो धीरे-धीरे आय का अच्छा स्त्रोत बन गये। सातवीं शताब्दी तक यहां ईस्लाम पूर्व इरानियों का सेशेनिय साम्राज्य रहा। इसके बाद उमायद खलीफे जो कि प्रथम मुस्लिम वंश के रूप में जाने जाते हैं, ने यहां ईस्लाम की स्थापना की और ईरान, भारत तथा चीन जैसे देशों तक व्यापारिक मार्ग बनाए और जहाजों के माध्यम से माल-असबाब भेजना शुरू किया। दुबई का पहला ज्ञात रिकार्ड सन् १७९९ का है जिसमें इसे अबूधाबी के अधीन बताया गया। आज दुबई, अबू धाबी तथा अन्य ५ शेख सल्तनतों को मिलाकर यू.ए.ई. यानि संयुक्त अरब अमीरात का हिस्सा है। अबू धाबी में मोतियों की गोताखोरी प्रचुरता से होती थी। गोताखोर एक मिनट से डेढ़ मिनट तक गोता लगाते थे। एक गोताखोर एक दिन में कम से कम ३० गोते लगाता था। तब न तो ऑक्सीजन टेंक थे और न ही किसी तरह के यन्त्र। गोताखोर अपनी नाक पर चमड़े की क्लिप लगाते थे और अपनी उंगलियों व अंगूठों पर चमड़ा लपेट देते थे जिससे सीपियों की खोज करते हुए उनका बचाव हो सके। इन गोताखोरों को दैनिक वेतन नहीं मिलता था वरन आय का हिस्सा दिया जाता था। सोलहवीं शताब्दी में हिन्द महासागर में स्थित ओमान पर पुर्तगाली कब्जा था। वास्कोडिगामा भारत की खोज में इसी तरफ से गया था। तब ओटोमान से लड़कर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लिया था। यह क्षेत्र समुद्री लुटेरों का आतंक बन चुका था। यूरोपी और ओमानी नौसैनिक बराबर खाड़ी के इस मुँह की गश्त करते थे। ब्रिटेन के जहाज भारत से माल लेकर आते थे और वहां माल लेकर जाते थे जिन्हें ये लुटेरे लूट लेते थे। सन् १८३३ में दुबई पर अल मखतूम वंश ने कब्जा कर इसे अलग सल्तनत बना लिया। १८५३ में खाड़ी के शेखों ने ब्रिटेन के साथ एक संधि की जिससे समुद्री लुटेरों के आतंक पर रोक लगाने में मदद मिली मगर इससे क्षेत्र में ब्रिटिश प्रभाव बढ़ गया। १८९४ में क्षेत्र के प्रमुख नगर डेरा में भयंकर आग लग गई जिससे समूचा शहर राख हो गया। आज दुबई का विस्तार इतना हो गया कि डेरा भी दुबई शहर का अंग बन गया है। क्षेत्र के प्रमुख व्यापारिक समुद्री मार्ग पर अवस्थित होने से व्यापार दिनों-दिन बढ़ता गया और आग से हुए नुक्सान की क्षतिपूर्ति के साथ साथ और अधिक उन्नति होती गई। इसी सफलता से प्रेरित होकर दुबई ने ब्रिटेन से एक और संधि कर उसका संरक्षण स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही समस्त विदेशी व्यापारियों को कर मुक्त कर दिया। शीघ्र ही ब्रिटिश कम्पनियों के जहाज यहां रूकने लगे। उस वक्त यहां की एक चौथाई आबादी विदेशियों की थी हालांकि इसकी तुलना आज की स्थिति से करें तो यह कुछ भी नहीं है क्यूंकि वर्तमान में यहां की ८५ से ९० प्र.श. आबादी विदेशियों की है। क ई शेखों के बाद सन् १९१२ में शेख सईद बिन मखतूम यहां के राजा बने और लम्बे समय तक उन्होंने शासन किया। शेख सईद को आधुनिक दुबई का राष्ट्रपिता कहा जाता है। १९३० में विश्वव्यापी मन्दी से यहां का मोतियों का व्यापार प्रभावित हुआ। इन्हीं दिनों कृत्रिम मोती का भी आविष्कार हो गया जिससे यहां की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई। शेख सईद ने तुरन्त वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में दुनिया भर से माल का आयात करना शुरू कर दिया। इस माल को वे अन्य क्षेत्रों में निर्यात करने लगे। बन्दरगाह कर मुक्त था इसलिये इसमें भारी सफलता मिलने लगी। तेल की खोज के पहले दुबई की आर्थिक स्थिति सुधारने, विकास करने तथा राजकीय निर्णयों में यहां के व्यापारियों की केन्द्रीय भूमिका रही। आज भी यहां के व्यापारी आर्थिक मामलों और राजनीतिक ढांचे में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। हकीकत में यहां व्यापारी ही सबकुछ हैं। वे हर तरह की सेवाएं प्रदान कर रहे हैं, वे शहर के योजनाकार हैं, वे सांस्कृतिक मध्यस्थ हैं और सबसे उपर वे अन्तर्राष्ट्रीय दूत हैं जो पूरी दुनिया में देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि यह कहा जाय कि दुबई पूरी दुनिया के लिये 'मुक्त व्यापार व्यवस्थाÓ का शोकेस है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। (जारी) द्यद्यद्य पुराने दुबई का एक दृश्य ।
दुबई यात्रा संस्मरण-६
सामाजिक उत्सवों में वह मिठास और आनन्द नहीं रहा 20 ११ में दादाजी के विवाह की स्वर्ण जयंती आ रही है, इसलिये पूरा परिवार ३-४ साल पहले से ही उत्साहित था। सब इसे किस तरीके से मनाया जाय इसके लिये अपनी-अपनी राय देते थे, मगर दादी सब सुनती रहती और मन्द-मन्द मुस्काती रहती। उनके मन में क्या चल रहा था किसी को पता नहीं। पलक से छोटी कनक मुम्बई में सुभाष घई के विसलिंग वुड्स में पढ़ती है। कहानियां लिखना, उन पर फिल्म बनाना, डायरेक्ट करना उन्हें सिखाया जाता है। कनक बचपन से ही कला के प्रति आकर्षित रही है। वह पेन्टिंग बहुत अच्छा करती है। उसकी बनाई एकाध शोर्ट फिल्म मैंने भी देखी तो एहसास हुआ कि बच्ची में हुनर है। कनक दादा-दादी के तमाम पुराने वीडियो इकट्ठे करने में लग गई। ५० साल पहले तो वीडियो का चलन ही नहीं था। इसलिये शादी के वीडियो का तो सवाल ही नहीं। उस वक्त तो रंगीन फोटोग्राफी तक नहीं होती थी। कुछेक छोटे-छोटे फोटो जरूर मिले। इन सबसे वह एक वीडियो तैयार करने में लग गई ताकि समारोह के दौरान इसे सभी को दिखाया जा सके। फोटोग्राफी आजकल कितनी सुगम हो गई है इसकी पहले कभी कल्पना तक नहीं थी। कभी रील खरीदी जाती थी जिसमें ८ या १२ फोटो होते थे। इन्हें धुलाकर नेगेटिव तैयार की जाती थी और नेगेटिव से ब्लेक एण्ड वाइट फोटू बनते थे। ३५ एम.एम. के केमरे महंगे आते थे। इस कारण इनका चलन इतना नहीं था। इनमें जो रील लगती थी उसमें एक साथ ३६ फोटो खींचे जा सकते थे। विवाह या अन्य समारोहों में लोग गिनती से फोटो खिंचाते थे क्यूंकि उतनी ही रीलें लगती थी। फ्लेश के लिये अलग से बल्ब आते थे। अब तो वह सब बदल गया है। डिजीटल टेक्नोलोजी आने से रीलों की जरूरत ही नहीं। केमरों में एसी एसी चिपें लग जाती हैं जिनसे एक साथ हजार फोटो खींचे जा सकते हैं। ये फोटो सीडियों में पड़े रहते हैं, जिनके प्रिन्ट बनवाने तक की जहमत नहीं की जाती। कम्प्यूटर में जब चाहे देख लो। फोटो भी जी भर के खिंचाये जाते हैं क्योंकि अब कोई रीलें तो लग रही नहीं। इसी तरह वीडियो भी डिजीटल हो गये। पहले तो वी.एन.एस. की बड़ी-बड़ी कैसेटें आती थी जिन्हें वी.सी.आर. में चलाकर ही देखा जा सकता था। अब तो वीसीआर और कैसेटें दोनों गायब हो गये। ये भी डीवीडी में आने लगी। जिसे कम्प्यूटर पर देखलो और हो गया काम। वैसे भी शादी-ब्याह व अन्य अवसरों पर खिंचे जाने वाले वीडियो धूल ही चाटते हैं, कोई इन्हें नहीं देखता। यही हाल फोटोग्राफ का है, फोटो जरूर खिंचा लेते हैं मगर उनकी एलबम बनाकर रखने की जहमत तक नहीं उठाई जाती। कनक के सामने यही समस्या आई। भाई साहब को बचपन से ही फोटोग्राफी का शौक था। एक से एक आला केमरे उनके पास थे, एसे एसे केमरे जो उदयपुर के चोटी के प्रोफेशनल फोटोग्राफरों के पास भी नहीं थे। इसके बावजूद भी उनके द्वारा लिये गये चित्र कहीं भी व्यवस्थित नहीं मिले। जब साल भर भी शेष नहीं रहा तब समारोह की तैयारियों पर विचार होने लगा। छोटे से, कम लोगों के समारोह की योजना बनाई जिसमें अत्यन्त निकट के लोगों को ही निमन्त्रित करने की सोची। आजकल एक अजीब सी भेड़ चाल चल निकली है कि किसी के भी घर कोई शादी हो, समारोह हो वह अनाप शनाप कार्ड बांट देता है। हल्की सी भी जान-पहचान हो तो कार्ड दे देते हैं, कई दिखते हुए लोगों को तो बिना पहचान तक के कार्ड दे देते हैं। कार्ड मिलने वाले भी इसी तरह जितने भी कार्ड आते हैं सबके यहां चले जाते हैं। जितने कार्ड, उतने लिफाफे। आजकल लिफाफों का चलन कम होता जा रहा है। यह बहुत अच्छी बात है। कुछ लोगों ने लेना बन्द कर दिया तो कुछ ने देना। समारोहों में इतनी भीड़ हो जाती है कि न तो बुलाने वाला एक एक मेहमान से मिल कर उसकी उपस्थिति का आनन्द ले सकता है और न जाने वाला। जाने वाले को तो चार जगह और जाना होता है इसलिये फटाफट डाक डाली और निकल पड़ता है। सभी निमन्त्रणों में जो खास होता है या जिसका आयोजन भव्य होता है वहीं वह खाना खाता है। यही आयोजन अगर कम लोगों के हों तो खर्चा भी कम होता है और उत्सव का आनन्द भी आता है। पहले के जमाने में तो विभिन्न समाजों में एक दिन में एक-एक खाना ही होता था। एक ही दिन तीन-चार शादियां भी होती तो उनके खाने अलग-अलग दिन होते थे। एक दूसरे से पूछ कर या समाज की पंचायत द्वारा इसका निर्धारण हो जाता था। इसी तरह निमन्त्रण भी हर किसी को नहीं दिया जाता था। रिश्तेदारों और अन्तरंग मित्रों को तो दिया ही जाता था मगर इससे आगे सोच समझ कर ही दिया जाता था कि पूर्व में उसके घर काम पड़ा तो अपने को बुलाया कि नहीं। जिसे निमन्त्रण मिलता वह भी एसे निमन्त्रणों पर विचार करता कि वह भविष्य में उससे सम्बन्ध रख पायेगा या नहीं, उसके घर काम पड़ेगा तो क्या उसकी हैसियत उसे बुलाने की है या नहीं। यही बात उपहार रखने या झेलने में होती थी जितना रखना होता उतना ही रखा जाता, बाकी का लौटा दिया जाता। मगर आजकल इस तरह का कोई अनुशासन नहीं रहा। इस वजह से आयोजनों में एकत्र होने का जो आनन्द आता था, रिश्तों की जो मिठास थी वह सब खत्म हो गई है और सारा अभ्यास महज एक औपचारिकता और दिखावा भर रह गया हैै जिसमें एक-दूसरे से आगे बढऩे की होड़ मची है। आज तो हमारे यहां गोदामों तक में अनाज सड़ रहा है, गोदामों के बाहर तो सड़ता ही है, अब तो शक्कर तक की यह नौबत आ गई है मगर कभी अनाज की कमी हुआ करती थी। अतिथि नियन्त्रण कानून लागू होते थे। सप्लाई वाले आयोजनों पर छापे मारते थे। घर धणी एक निश्चित मात्रा के लोगों का ही खाना कर सकता था। खाने में भी व्यंजनों की संख्या सीमित रखनी पड़ती थी। तब जाने वाले भी किसी आयोजन में सोच समझ कर ही जाते थे। हां यह जरू र सबकी इच्छा थी कि आयोजन अच्छा हो, भव्य जरूर हो मगर उसमें भी सादगी की एक मर्यादा हो। इन्हीं दिनों जयपुर में एक उत्सव में जाने का काम पड़ा। मेरी भान्जी दीप्ती की लड़की कादम्बरी की शादी थी। कंवर साहब अशोक अग्रवाल जयपुर के प्रतिष्ठित बिल्डर हैं। याज्ञवल्क्य इन्जिनियरिंग कोलेज उन्हीं का है। आयोजन उत्कृष्ट था। भव्यता में भी सादगी के दर्शन हो रहे थे। तुरन्त प्रेरणा मिली कि अपन भी इसी तरह का छोटे पैमाने का आयोजन करें। आयोजन एक इवेन्ट मैनेजमेन्ट कम्पनी द्वारा किया गया था। उसके बारे में पता किया तो मेरे आश्चर्य और प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। (जारी) द्यद्यद्य पुराने दुबई का एक दृश्य ।
दुबई यात्रा संस्मरण-७
पहले क्रूज पर जाने का कार्यक्रम बना जयपुर में वह आयोजन जिस कम्पनी ने किया था उसके प्रभारी और कोई नहीं वरन उदयपुर के ललित टण्डन थे। जो यहां से पहले 'प्रतिदिनÓ अखबार निकालते थे। ललित से बात की तो उन्होंने बताया कि वे अच्छे से अच्छा आयोजन करवा देंगे। ललित ने कठिन परिस्थितियों में उदयपुर छोड़ा था, अखबार भी उन्हें छोडऩा पड़ा था, वे बता रहे थे कि अभी भी संघर्ष ने उनका पीछा नहीं छोड़ा है मगर इवेन्ट मैनेजमेन्ट के काम से उन्हें सृजनात्मक संतोष प्राप्त होता है। आयोजन में देरी थी इसलिये उन्हें यही कहा कि बाद में बताएंगे। साल २०११ लगते ही सबकी उमंगें हिलोरें लेने लगी। कार्यक्रमों को अन्तिम रूप दिया जाने लगा। एक भारी समस्या यह थी कि ४ जुलाई के आसपास मानसून सक्रिय हो जाता है और इन दिनों आयोजन रखने का मतलब था वर्षा का खतरा। ५० साल पहले भाई साहब की शादी के लिये गंगापुर बारात जा रही थी तब भयंकर वर्षा हुई थी। पोटला की नदी उफान पर थी और हमारी बस को नदी उतरने तक किनारे ही पड़ा रहना पड़ा था। आज तो पल भर में दुनिया के किसी कोने में फोन पर बातचीत हो जाती है लेकिन तब नम्बर प्लीज का जमाना था। फोन करने के लिये स्वयं डायल करने की भी सुविधा नहीं थी। फोन उठाते ही ऑपरेटर नम्बर प्लीज कहकर नम्बर मांगता था, बताने के बाद वह नम्बर मिलाता और बात होती। वह फोन व्यस्त होता तो ऑपरेटर बोलता नम्बर खाली नहीं है। तब बाहर फोन करने के लिये अलग से ट्रंक काल बुक कराना पड़ता था। काल बुक करते ही टेलीफोन इन्क्वायरी को कहना पड़ता था कि नम्बर जल्दी से मिलवा दें। नई पीढ़ी के बच्चों को तो शायद इस बात का अहसास भी नहीं होगा पहले फोन करना कितना कठिन कार्य था। ट्रंक काल लगने में घंटों लग जाते थे। काल मिलाने के बाद टेलीफोन के पास ही बैठा रहना पड़ता था, पता नहीं कब फोन लग जाये। थोड़ी-थोड़ी देर में इन्क्वायरी से पूछते कि कितनी देर लगेगी। पी.पी. फोन करने पी.पी. अवेलेबल नहीं होता तो काल पेण्डिंग करवाई जाती। उस जमाने में हरेक के घर तो फोन होते नहीं थे इसलिये आसपास के किसी मिलने वाले का नम्बर सभी लोग देकर रखते थे। अर्जेन्ट काल करने के दुगुने पैसे लगते थे और लाइटनिंग काल करने के आठ गुने। कभी कोई मौत मरण या आवश्यक कार्य होता तो टेलीफोन एक्सचेंज में जान पहचान निकाली जाती और उनसे प्रार्थना की जाती कि फोन जल्दी लगवा दें। उस वक्त टेलीफोन ऑपरेटरों की बहुत महत्ता थी। हर कोई उनसे जान पहचान रखना चाहता था। यह सारी व्यवस्था दैनन्दिन जीवन का अंग थी, इससे परे कि स्थिति की कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था मगर देखते ही देखते ये सारी व्यवस्थाएं एकदम गौण हो गई और नई व्यवस्थाओं ने इनका स्थान ले लिया। कौन जाने कल आज की यही व्यवस्थाएं जो अपरिहार्य प्रतीत होती हैं इसी तरह गौण हो जाये और इनका स्थान अन्य ले ले। हम लोग बरसती बारिश में रात भर नदी किनारे इन्तजार करते रहे, न तो कहीं फोन कर सके और न कोई इत्तला। उधर बारात गांव नहीं पहुंची चिन्ता होने लगी। हमें ढूंढऩे अन्य रास्ते से एक पार्टी जीप लेकर उदयपुर पहुंच गई। सुबह जब बारिश रूकी, नदी का पानी उतरा तो हम गांव पहुंचे। उस घटना को याद कर हमारे दिल दहल गये कि अपनी तरफ से अच्छे से अच्छा आयोजन करें और वर्षा सारा मजा किरकिरा कर दे तो क्या फायदा। हम ५० वर्ष पहले की घटना की पुनरावृत्ति करने वाले थे तो वर्षा भी बरसने की पुनरावृत्ति कर सकती थी। यही सब विचार करके निर्णय किया कि आयोजन वर्षा के बाद सर्दियों में भी रखा जा सकता है, वैसे भी ४ जुलाई से पहले सबके स्कूल खुल जाने वाले थे और सब वापस अपने अपने ठिकाने पहुंचने वाले थे इसलिये यह विचार सबको पसन्द आ गया। मेरा एक भान्जा है मुनीश अग्रवाल। वह कम्प्यूटर इन्जीनियर है, अत्यन्त प्रतिभाशाली और कुशल। पिछले ३५-५० सालों से अमेरिका में ही एक कम्पनी में कार्यरत है। वह रहता भले ही वहां है मगर उसकी आत्मा भारत में ही रहती है। पहले तो वहां पढऩे गया था, पढऩे के दौरान ही खर्चा चलाने पार्ट टाईम नौकरी कर ली। पढ़ाई पूरी हुई तो सोचा साल-दो साल यहां नौकरी कर लें फिर भारत चले जायेंगे। ये साल दो साल, वहां रहने और यहां आने के उहापोह में कब ३५-४० सालों में बदले पता ही नहीं चला और वह यहां नहीं आ सका। जब भी आने की सोचता कोई न कोई कारण या प्रलोभन उसे रोक देता। बच्चे हो गये तो और भी मुश्किल हो गई, उनकी खातिर वहां रहना जरूरी हो गया। अमेरिका जाने वाले आम व्यक्ति की यही कहानी है जिस वजह से वह दो संस्कृतियों और दो जीवन शैलियों के बीच उलझ कर रह जाता है। मुनीश की पत्नी है प्रीति। बहुत सुन्दर, बहुत प्यारी। उसकी खिलखिलाहट एसी है कि मायूस चेहरे पर भी वह मुस्कराहट ला देती है। आधुनिका है, शिक्षित है इसके बावजूद भी पति और परिवार को प्राथमिकता देते हुए उसने स्वयं का केरियर नहीं चुना और अपने बच्चों का भविष्य निर्माण करने के लिये घर पर ही रहना चुना। आजकल तो हमारे यहां पर ही युवतियां अपने कैरियर को प्राथमिकता देने अपने पति तक को छोड़ देती है तो अमेरिका में रह रही एक युवती द्वारा इस तरह का त्याग एक आदर्श उदाहरण है, जहां हर किसी को अपने कैरियर की पड़ी रहती है। प्रीति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह बहुत सुन्दर कविताएं लिखती हैं। अपने अनुभवों और आसपास के लोगों से रिश्तों को अपनी कविताओं में जो भावाभिव्यक्ति देती है उसे देखकर दंग रह जाना पड़ता है। इन्हीं दिनों प्रीति भारत आई हुई थी। अचानक भाभीजी ने किसी भी तरह के आयोजन के लिये साफ इन्कार कर दिया और कहीं घूमने चलने को कहा तो प्रीति ने सुझाव दिया कि कोई क्रूज ले लेते हैं, वह भी सपरिवार अमेरिका से उसमें शामिल हो जायेगी। बात सबको पसन्द आ गई और कोई सस्ता सा क्रूज तलाशने का कार्य संदीप को सौंपा गया। (जारी) द्यद्यद्य आधुनिक दुबई ।
दुबई यात्रा के संस्मरण – ८
महंगे क्रूज का इरादा छोड़ दुबई जाना तय किया सं दीप गोयल 'प्रात:कालÓ के मुख्य प्रशासक हैं। वे जयपुर कार्यालय में बैठते हैं मगर नियमित रूप से मुम्बई, उदयपुर, दिल्ली कार्यालयों का दौरा करते रहते हैं और पत्र की प्रगति व इसके दैनन्दिन संचालन व सुधार में अपनी भूमिका अदा करते हैं। वे एक कुशल प्रशासक हैं और सबको कठोर अनुशासन में रखते हैं। जब यात्रा के लिये क्रूज लेने का निर्णय लिया गया तो उन्होंने सब तरफ पता किया। पहले मुम्बई से जरूर गोआ और सिंगापुर के लिये क्रूज रवाना होते थे मगर काफी सालों से बन्द हो गये हैं। मुंबई से दुबई के लिये भी एक बार क्रूज चला था मगर वह भी बन्द हो गया । आसपास सिर्फ सिंगापुर ही एसा क्षेत्र था जहां से क्रूज चलते हैं जो थाइलेण्ड, मलेशिया के विभिन्न स्थानों की सैर कराते हैं। अन्य क्रूज यूरोप से लेने पड़ते हैैं। पता लगाया तो क्रूज का मामला बहुत महंगा पड़ रहा था। पहले तो सिंगापुर जाओ। उसके आने-जाने का किराया और उसके बाद फिर क्रूज का टिकिट। पूरे परिवार को एक साथ ले जाने के लिये यह बूते से बाहर था इसलिये पुन: अन्य स्थान पर विचार करना शुरू हुआ। इस बीच अमेरिका से खबर आई कि प्रीति की एक आंत में फोड़ा हो गया है और उसे ऑपरेशन कराने अस्पताल में भर्ती होना पड़ेगा। अपने यहां तो फटाफट ऑपरेशन हो जाते हैं मगर वहां डॉक्टर सर्जरी की डेट देते हैं। प्रीति को भी डेढ़-दो महीने बाद की तारीख मिली। ऑपरेशन के बाद भी उसे महीने-दो महीने और आराम करना पड़ सकता है इसलिये उसका तथा उसके परिवार का हमारे साथ यात्रा पर आना रद्द ही हो गया मगर इस समाचार से सब लोग चिंतित हो गये। बहिन सुशीला एसे समय उनके साथ रहने अमेरिका जाना चाहती थी मगर यह सोच कर रूक गई कि वहां जाने से उनकी परेशानियां बढ़ नहीं जाये। अमेरिका में हमारे यहां की तरह श्रम सस्ता नहीं है। वहां वर्ग ही दो हैं। अति उच्च वर्ग और साधारण वर्ग। समूची आबादी साधारण वर्ग में ही आती है। अति उच्च वर्ग में बहुत कम लोग हैं जो नौकर-चाकर, ड्राईवर, मेड सर्वेन्ट आदि रख सकते हैं बाकी सबको तो अपना काम खुद ही करना पड़ता है। स्त्री-पुरूष दोनों मिलकर घर का कामकाज निपटाते हैं। यही सोचकर वे नहीं गये मगर जब प्रीति को इस बात का पता चला तो उसने उन्हें आग्रहपूर्वक वहां बुला ही लिया। वैसे वहां बसे भारतीयों के परिवारों की स्त्रियां जब प्रसव के समीप होती हैं तो जरूर अपनी माताओं या सास को वहां बुला लेती हैं। प्रसव का सारा कार्य तो अस्पतालों में ही होता है मगर पीछे से घर के दैनन्दिन कामकाज और प्रसव के बाद जच्चा-बच्चा की देखभाल में बहुत मदद मिल जाती है वरना इस काम के लिये आया या बाई आदि रखने का कार्य बूते के बाहर की बात हो जाती है। संदीप ने इस बीच और पूछताछ की, इन्टरनेट खंगाला तो दुबई का एक मात्र नाम एसा उभर कर आया जहां हम लोग जा सकते थे। सबसे पूछा गया तो किसी को एतराज नहीं था, सब चाहते थे कि एक साथ कहीं न कहीं जाया जाय वैसे अन्दर की बात यह है कि किसी को यकीन नहीं था कि यह संभव हो पायगा इसलिये किसी को ज्यादा उत्साह भी नहीं था। संदीप लगा रहा। उसने कुछ ट्रेवल एजेन्सियों को तो कुछ एयरलाइन्स को ई मेल कर दी और अपना प्रस्ताव भेज दिया कि इतने लोगों की इतने दिनों की दुबई यात्रा है। हम एसा पैकेज चाहते थे जिसमें आना-जाना, ठहरना, खाना-पीना और घूमना फिरना सब शामिल हो। सबके जवाब आ गये तो यह भी मामला बड़ा महंगा साबित हो रहा था। मुम्बई में हमारे प्रतिनिधि हैं शिरीष चिटनीस। प्रात:काल उदयपुर की शुरूआत से ही वे विज्ञापन काम देख रहे हैं। मैंने जब १९७९ में प्रात:काल शुरू किया था तब विज्ञापनों की कोई समझ नहीं थी। तब तो एक जुनून था और जुनून जुनून में ही अखबार शुरू कर दिया था। कई अनुभवी लोगों ने मुझे टोका भी था कि क्यूं घर फूंक तमाशा देखना चाहते हो। उस वक्त हमारा प्रिंटिंग प्रेस अच्छा खासा चलता था, उदयपुर में नाम था। गाइडबुक्स और पोस्टकार्डों का भी अच्छा काम था इसलिए कई मिलने वाले चिन्तित थे मगर मैंने किसी की परवाह नहीं की। अखबार शुरू होने के कुछ समय बाद ही मुम्बई से एक व्यक्ति का फोन आया कि वह प्रात:काल के लिए विज्ञापन का काम करना चाहता है और मुझसे मिलने उदयपुर आना चाहता है। मैंने कहा कि आ जाओ। अगले ही दिन एक पतला-दुबला व्यक्ति मेरे सामने था। उसने अपना नाम शिरीष चिटनिस बताया। मैं समझ गया कि यह फोन वाला ही व्यक्ति है मगर मैं हैरत में पड़ गया कि इतनी जल्दी कोई मुम्बई से कैसे आ सकता है। उसने बताया कि वह हवाई जहाज से आया है। मेरा सिर चकरा गया। कोई मुझसे मिलने हजारों रूपये खर्च कर हवाई जहाज से आये वह भी विज्ञापन के कार्य के लिये, यह कैसे संभव है? मगर वह सच्चाई के रूप में मेरे सामने था और शाम को वापस जा भी हवाई जहाज से रहा था। हमारी बात मुश्किल से ५ मिनिट भी नहीं चली होगी। शिरीष ने कहा वह विज्ञापन का कार्य करना चाहता है, मैंने कहा नेकी और पूछ पूछ, मुझे क्या एतराज हो सकता है। वह दिन है और आज का दिन है शिरीष ने प्रात:काल की बहुत मदद की। जब प्रात:काल का प्रकाशन मुम्बई से शुरू हो गया तब तो उसकी भूमिका आधार स्तम्भ की थी। शिरीष बहुत सहयोगी प्रवृति के अत्यन्त हंसमुख व्यक्ति हैं। एक खासियत उनकी और है कि वे विश्व घुमक्कड़ यानि कि ग्लोब ट्रोटर हैं। हर साल वे विश्व भ्रमण के अन्तर्गत किसी न किसी देश में जाते ही हैं। वे कई देशों की यात्राएं कर चुके हैं। संदीप ने यात्रा के बारे में शिरीष से राय ली। शिरीष के एक भाई जगदीश किसी ट्रेवल कम्पनी के लिये काम करते हैं, शिरीष ने उनसे भी सलाह ली कि यात्रा का पैकेज कैसे कम से कम हो सकता है। संदीप शिरीष को लेकर मुम्बई के कई ट्रेवल ऑफिसों में गया। अन्तत: यह तय हुआ कि आने-जाने के लिये एयरलाइन्स को पैकेज में शामिल नहीं किया जाय क्यूंकि ट्रेवल एजेन्सियां तो आने-जाने के पूरे टिकिट का पैसा लेती हैं जबकि एयरलाइन्स कम्पनियां ग्रुप टिकिट पर कभी-कभी अच्छी रियायत दे देती हैं। किंगफिशर, एयर इण्डिया और जेट को मेल कर दी कि इतने लोगों के आने-जाने के ग्रुप टिकिट का कोटेशन दें। (जारी) द्यद्यद्य दुबई-रात की रोशनी में ।
दुबई यात्रा के संस्मरण – ९
सन् ६६ तक दुबई में भारतीय रूपया चलता रहा ब्रिटिश राज में भारतवर्ष अंग्रेजों का पूर्व के तमाम देशों पर राज करने और उनसे व्यापार करने का प्रमुख केन्द्र था। यह कहावत तो बहुत प्रसिद्ध थी कि ब्रिटिश राजमुकुट में भारत रत्न था - ज्वेल इन दी क्राउन, लेकिन १९४७ में भारत के स्वतंत्र होने के पश्चात भी १९६६ तक दुबई व अन्य खाड़ी देशों में भारतीय मुद्रा का चलन भारत की शक्ति का परिचायक था। ब्रिटिशराज में पूर्वी अफ्रीका, सउदी अरब तथा दुबई सहित खाड़ी के तमाम देशों में भारतीय मुद्रा का प्रचलन था जो १९४७ में भारत के स्वतन्त्र होने के बावजूद सन् १९66 तक रहा। वर्षों तक खाड़ी देशों में भारतीय रूपयों की तस्करी होती रही। इसके बदले में यहां से लोग सोना लेकर भारत जाते थे। भारत में सोने की कीमत ज्यादा होने के कारण तस्करी दिनों दिन बढ़ती रही। दरअसल भारत में सोने के प्रति दीवानगी वर्षों से रही है। खासकर स्त्रियों में। इस कारण धीरे धीरे सोने की तस्करी एक बहुत बड़े व्यापार में बदल गई। दुबई से सोना तस्कर होकर मुंबई आता था और मुंबई से देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचता था। उदयपुर में भी कई लोग इस काम में लगे हुए थे। यहां के कुछ सोना-चांदी के व्यापारी इन लोगों को मुम्बई भेजते थे जहां से ये सोने के बिस्कुट लेकर लौटते थे। इसके लिये कई लोगों ने विशेष जाकेटें बनवा रखी थी जिसके अन्दर दोनों तरफ एक साथ कई बिस्कुट छिप जाते थे। इस काम में लिप्त मामूली हैसियत के कई लोग देखते ही देखते अच्छे पैसे वाले बन गये। काम में जोखिम थी इसलिये होशियार लोग थोड़ा पैसा कमा लेते और अन्य धन्धा करने लगते। अब तो सोने के भाव सब जगह एक जैसे हो गए हैं इसलिए तस्करी लगभग खत्म ही हो गई है। दुबई में जब सोने की तस्करी बहुत बढ़ गई तो भारतीय रूपये की वहां बहुलता हो गई। यह रूपया वापस भारत आता और पोण्ड स्टेर्लिंग में बदल कर वापस दुबई जाता। सारा काम अवैधानिक होता था इसलिये धीरे धीरे भारत में विदेशी मुद्रा की कमी होने लगी। इस समस्या से निपटने १९५९ में भारतीय रिजर्व बेंक ने खाड़ी देशों के लिये विशेष नोट जारी किये। ये रूपये भारत में चलने वाले रूपयों जैसे ही होते थे सिर्फ इन पर गल्फ रूपीज अलग से लिखा जाने लगा तथा इनके रंग भी बदल दिये गये। एक रू. का नोट भारत में जामुनी चलता था तो दुबई के लिये लाल रंग का कर दिया गया। इसी तरह ५ का नोट हरे की बजाय केसरिया, १० का नोट बेंगनी की जगह लाल और १०० का नोट नीले की जगह हरा कर दिया गया। इसी तरह हज यात्रियों के लिये भी रिजर्व बेंक ने अलग नोट जारी किये क्यूंकि हज यात्रियों द्वारा दिये गये नोट भी पोण्ड में बदलवाने भारत आते थे। सउदी अरब के बेंक सीधे आर.बी.आई. बम्बई को ये नोट भेजता था। इसे रोकने के लिये रिजर्व बेंक ने विशेष हज नोट जारी किये। इन पर अलग से हज लिखा होता था। समस्या तब उत्पन्न हुई जब १९६६ में भारतीय रूपये का अवमूल्यन हो गया। भारत सरकार ने अचानक यह निर्णय लिया। खाड़ी देशों को इसकी कोई पूर्व सूचना नहीं थी। दे भी नहीं सकते थे। इस कारण इन देशों को भारी नुक्सान हो गया। इन्होंने ब्रिटेन से बीच बचाव कर भारत से यह नुक्सान भरवाने को कहा मगर ब्रिटेन ने हाथ झटक लिये। भारत पर वैसे भी उसका कोई प्रभाव नहीं रह गया था। अन्तत: भारत से सीधे बात की गई और भारत ने नुक्सान की भरपाई कर दी। इसके पश्चात् दुबई, कतर ने तो सउदी रियाल की मुद्रा अपना ली लेकिन मस्कत और ओमान ने अवमूल्यन के बाद भी भारतीय मुद्रा का चलन जारी रखा जो कई वर्षों तक चला। दुबई व कतर में सउदी रियाल थोड़े दिनों ही चला इसके पश्चात् इन दोनों देशों ने अपनी अलग मुद्रा चला दी। जिसे दिरहम नाम दिया। १९७१ में जब संयुक्त अरब अमीरात बना तो दुबई उसका अंग बन गया और दिरहम की नई मुद्रा चलाई गई। दुबई के एक दिरहम का जो सिक्का निकाला गया उससे ठगी की वारदातें बहुत बढ़ गई। आधुनिकता के कारण दुबई में जगह जगह स्लोट मशीनें लग गई। जिनमें सिक्का डालने पर वांछित वस्तु मिल जाती थी। दुबई के १ एक दिरहम में १०० फिल होते हैं। ८ फिल में एक फिलीपीनी पीसो मिल जाता है जो आकार और वजन में बिलकुल एक दिरहम के सिक्के जैसा है। लोग लाखों की संख्या में ये पीसो मंगाने लगे और स्लोट मशीनों से सामान निकालने लगे। उन्हें तो ८ फिल में ही १०० फिल का माल मिलने लगा। इसी तरह पाकिस्तानी ५ रू. भी इसी आकार प्रकार का था जो २०-२१ फिल में आ जाता था। अन्तत : सरकार ने कार्रवाई की और ठगी पर रोक लगाई। १९९४ में भारत ने नियमों का उदार करते हुए अनिवासी भारतीयों के लिये भारत लौटते हुए सोना लाने के नियमों में परिवर्तन कर दिया। इसके तहत प्रत्येक एन.आर.आई. अपने साथ ५ किलो सोना ला सकता था जिस पर उसे २२० रू. प्रति १० ग्राम शुल्क चुकाना पड़ता। सरकार की यह योजना अत्यन्त सफल हुई और इससे सैंकड़ों करोड़ डालर की विदेशी मुद्रा एकत्र हो गई क्यूंकि शुल्क विदेशी मुद्रा में लिया जाता था। इस योजना का दुबई के स्वर्ण निर्यातकों तथा भारत स्थित स्वर्ण व्यापारियों ने जम कर फायदा उठाया मगर सर्वाधिक लाभ खाड़ी देशों में काम कर रहे उन कर्मचारियों ने उठाया जिन्हेें एन.आर.आई. का दर्जा प्राप्त था। शुल्क चुकाने के बावजूद भी भारत में उस वक्त सोने के भावों में जो अन्तर था उससे सबको बहुत मुनाफा हो जाता था। ६ महीने काम करने के बाद कोई भारतीय घर लौट रहा होता तो सोने के व्यापारी उससे सम्पर्क करते, उसे आने जाने का किराया देते, सीमा शुल्क देते और उसका मेहनताना। एक व्यक्ति अपने साथ ४२ सोने की छड़े लाता जो लगभग 5 किलो होती। भारत आने पर वह कस्टम शुल्क अदा करता। बाहर निकलते ही सोने के व्यापारियों के आदमी उससे छड़े ले लेते और बाजार में बेच कर उसक ा पैसा डालरों में दुबई हवाला करवा देते। अपने साथ ५ किलो सोना लाने वालों की उतनी हैसियत नहीं होती थी, कस्टम अधिकारी इस पर कई बार एतराज करते। शुरू में कई लोगों को पकड़ा भी, मामला अदालत तक गया मगर अदालत ने उन्हें यह कह कर छोड़ दिया कि जब उसने पूरा सीमा शुल्क चुका दिया है तो किस बात की सजा। इसके बाद कस्टम वालों ने भी पकडऩा बन्द कर दिया। योजना की आशातीत सफलता देखते हुए सरकार ने ५ किलो की जगह १० किलो तक सोना लाने की अनुमति दे दी। (जारी) द्यद्यद्य दुबई में चला 10 रू. का लाल रंग का भारतीय नोट ।
दुबई यात्रा संस्मरण-१०
संयोग तो एक बार - दो बार होता है मगर तीसरी बार ...? संयोग एक बार हो, दो बार हो मगर तीन बार एसा हो जाय तो विचित्र लगता है। मेरे साथ एसा हुआ और आप तमाम पाठकवृन्द इसके साक्षी हैं। संयोग यह कि मेरी पिछली तीन विदेश यात्राओं के संस्मरणों की शुरूआत मेरे अभिन्न मित्रों की अकाल मृत्यु के साथ हो रही है। जिन लोगों ने मेरी नाइजिरिया व द. अफ्रीका यात्रा के संस्मरण पढे हैं उन्हें याद होगा कि इनकी शुरूआत मैंने अपने एक अभिन्न मित्र अमरसिंह नाहर के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए की थी। बाद में जब मैंने चीन-जापान की यात्रा के संस्मरण लिखने शुरू किये तब मेरे एक अन्य अभिन्न मित्र राजेन्द्र चोर्डिया का निधन हो गया। यात्रा वृतान्त की शुरूआत ही मैंने इस संयोग का जिक्र करते हुए की थी। आज जब दुबई यात्रा के संस्मरण लिखने बैठा हूं तो वही संयोग फिर घटित हो गया। मेरे अत्यन्त निकट के अभिन्न मित्र यशवन्त लाल कानूगा का निधन हो गया। इस घटना के बाद मैं विचार में पड़ गया कि आगे कोई यात्रा होगी तो क्या फिर एसी ही घटना घटित होगी ïïïï? यशवन्त उदयपुर के प्रसिद्ध व्यक्तित्व थे। एक बार कोई उनके संपर्क में आये तो कभी उनको नहीं भूल सकता। रविवार १० जुलाई २०११ को मैं उनके पास ही बैठा था। अच्छे भले बातें कर रहे थे। मेरे सामने ही अचानक हृदयाघात हुआ और उनका निधन हो गया। मौत को इतने नजदीक से देखने का यह अनूठा अनुभव था। एक मिनट में उनसे बात कर रहा हूं और अगले ही मिनट वे नहीं हैं। मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था। यशवन्त खरी-खरी कहने वाले अत्यन्त जीवन्त और जीवट वाले व्यक्ति थे। जितना उनका गुस्सा तेज था उतने ही अन्दर से वे मोम की तरह नरम थे। बच्चों के लिये टोफियों-गुब्बारों से हरदम उनकी झोली भरी रहती थी। हर तरह के सामाजिक कार्यों में उनकी अग्रणी भूमिका रहती थी। उदयपुर के बिखरे हुए अग्रवाल समाज को एक करने में उनकी भूमिका कभी भूलाई नहीं जा सकेगी। डाक टिकट, सिक्के और नोट संग्रह करने का उनका शौक जूनून की हदें पार कर चुका था। उनके संग्रह में एसे एसे डाक टिकट और सिक्के तथा नोट हैं जिनकी कीमत उनकी मूल कीमत से कई गुना ज्यादा हैं। एक अन्य शौक उनका अत्यन्त विचित्र था। वे बड़े बड़े नेताओं, खिलाडिय़ों, कलाकारों, हस्तियों आदि के हस्ताक्षर तथा उनके चित्रों का संग्रह तो करते ही थे लेकिन अपने सम्पर्क में आये बड़े बड़े न्यायाधीशों, कलेक्टरों, एस.पी. डी.आई.जी. आदि उच्च अधिकारियों से वे अपने लिये प्रमाण पत्र लेते थे। एसे दर्जनों प्रमाण पत्र उनके संग्रह में हैं। समाज में किसी भी काम का वे बीड़ा उठाते थे तो पूरा करके ही छोड़ते थे। उनकी एक बात बहुत अनुकरणीय है। उनके पिताजी का निधन हो गया तब सब यही अपेक्षा कर रहे थे कि वे बड़े खाने का आयोजन करेंगे मगर एसा करने की बजाय उन्होंने अपने पिताजी की स्मृति में उदयपुर के अग्रवाल समाज की एक टेलीफोन डायरेक्टरी प्रकाशित की और सबको वितरीत की। यह डायरेक्टरी सभी लोगों के लिये बहुत उपयोगी सिद्ध हुई जिससे प्रेरणा पा कर इसी तरह की अन्य डायरेक्टरियां भी प्रकाशित हुई। अगले वर्ष उनके विवाह की स्वर्ण जयन्ती है। उनकी इच्छा थी कि इस अवसर पर पुन: वे इसी तरह की डायरेक्टरी छपवाएं। अब वे तो रहे नहीं मगर अपने पीछे इष्ट मित्रों की बहुत बड़ी मण्डली छोड़ गये हैं जो जरूर उनकी इस इच्छा को पूरा करेगी। यशवन्त की धाक एसी थी कि हर कोई उन्हें अपने आगे रखना चाहता था। उनके व्यवसायों की विविधता भी अजीब थी। मूलत: तो स्टाम्प बेचते थे, कोर्ट में उनकी दुकान थी और तमाम न्यायिक अधिकारियों-वकीलों से उनका सम्पर्क था। कोई कोर्ट में किसी काम से आए तो उसकी क्या मजाल की यशवन्त से बिना मिले या उनके यहां बिना चाय पिये चले जाये। इसी तरह वे आतिशबाजी एवं पटाखों के भी व्यापारी थे। होली-दीवाली पर घर के बाहर ही बड़ी सी दुकान लगाते थे। यह महज उनका शौक था वरना कमाई तो इससे कुछ थी नहीं क्यूंकि ढेर सारे मिलने वाले लोगों को तो वे बिना पैसे ही पटाखे दे देते थे, कोई जबर्दस्ती पैसे देने भी लगे तो उनके नोट फेंक देते थे। इसी मिलने वाले के यहां से अगर यशवन्त कोई चीज खरीदने जाते थे तो अगला भी पैसा नहीं लेता, तब यशवन्त नोट निकालकर उसके सामने ही उन्हें फाडऩे लगते और कहते कि लेता है कि नहीं वरना यहीं फाड़ देता हूं। अगला क्या करता लेने ही पड़ते। दो-चार बार उन्होंने वाकई नोट फाड़ दिये थे और हर कोई उनका स्वभाव जानता था इसलिये कुछ नहीं कर पाता। यशवन्त उदयपुर में फोटोस्टेट व्यवसाय के पुरोधा हैं। जिस जमाने में आज की तरह फोटो कोपियर नहीं हुआ करते थे तब उन्होंने उदयपुर में पहली बार फोटो स्टेट मशीन लगाई थी। इसमें प्रतिलिपियां विशेष प्रकार के फोटोग्राफिक पेपर पर निकलती थी। उन्हें फोटोग्राफी का भी बहुत शौक था जिसे उन्होंने व्यवसाय में परिवर्तित कर दिया। इस काम में भी वही होता, यार-दोस्तों, मिलने वालों के फोटो खींच लेते मगर उनसे पैसे नहीं लेते। अधिकारीगण तो उनकी इस आदत का भरपूर फायदा उठाते, उन्हें फोटोग्राफी के लिये बुलाते, पैसे देने का तो सवाल ही नहीं। यशवन्त की यह दरियादिली निचले तबके और गरीब वर्ग के लोगों के लिये तो बहुत ज्यादा थी। किसी भी काम का या सौदे का इन लोगों को वे खुश होकर सवा या डेढ़ा दाम देते थे। यशवन्त के बारे में जितना लिख जाये कम है। उन जैसे जिन्दा दिल इन्सान रोज-रोज पैदा नहीं होते। आज वे हमारे बीच नहीं हैं। हमारे कई साथी समय पूर्व हमसे विदा लेकर चले गये। यशवन्त उनके लिये अक्सर कहते थे कि वो तो धोखा देकर चला गया, आज उसी तरह वे खुद हमें धोखा देकर चले गये। यशवन्त क ेजीवन की सबसे बड़ी पीड़ा थी उनके जवान बेटे की दुर्घटना में मौत, तबसे मानो भगवान से उनकी लड़ाई हो गई। परिवार के, मित्रों के साथ वे मन्दिर, तीरथ बहुत जाते थे, इन प्रसंगों का उत्साहपूर्वक आयोजन भी करते थे, सारा खर्च भी खुद उठाते थे मगर अन्दर जाकर दर्शन कभी नहीं करते थे, बाहर ही मन्दिर के चबूतरे पर बैठ जाते थे और मजाक में कहते थे कि मेरी तो भगवान्ये से लड़ाई है। एसे निराले, अनूठे यशवन्त को हार्दिक श्रृद्धांजलि। (जारी) द्यद्यद्य यशवन्त (दायें) के साथ मेरा (बायें) एक पुराना फोटो।
Shri Suresh Goyal is a leading social worker and is associated with various social, voluntary and educational institutions. He had an active role in establishment of Agrawal Sarvajanik Dharmshala, Pacific Dental College, Geetanjali Engineering College and Geetanjali Medical College in Udaipur.